December 2, 2010

सोचता हूँ

सोचता हूँ

की चढ़ाऊँ प्रत्यंचा

और छोड़ दूं

शब्द बाण |
 
मगर किधर?

इस जलाशय की कलकल बहती आवाज़ पर

या पानी की हंसती खिलखिलाती अठखेलियों पर?

क्या बयाँ कर पाऊँगा यह अनन्य शान्ति का आभास?

नहीं जानता

शायद जानना भी नहीं चाहता

बस आभास

और मन के सौर्यमंडल में घूमते

सितारे-से विचार

और हर विचार एक छिपा, सोया सौर्यमंडल |

Awakening

In the slumbering abyss of Eternity

I awoke

Resounding deep, a creature evolved, Beyond

A thought, as ancient as the first silence

Silent, as the hearts in union

Formless – as yesterday’s meal


I awoke.

And forgot

my eternal purpose.

I left home, wandered and returned

But only in body, never in the mind


I arose.

From the thirsty lips of Aghoris in Himalayas

From the grave musings of Llamas, rocking wisely

From the recesses of minds thirsty for knowledge


I arose

जागरण (Awakening)

असंख्य गहराइयों के अचेत चैतन्य में 

मै उठा |

कहीं दूर गूंजता, एक नाद-स्वर-रूप

एक विचार, पहली शान्ति से प्राचीन

शांत, जैसे अदृश्य बंधन से जुड़े हृदय

रूपहीन, जैसे बीते कल के भोजन का स्वाद |




मै जागा

और स्मृति लोप का शिकार बना

भूल गया

मेरा सर्वस्व अस्तित्व

घर छोड़ कई यात्राएं कर लौटा

पर मन के घर में बंधा रहा

मै जागृत हुआ, जन्मा |




हिमाद्री में तप-ताप से जलते प्यासे अघोरियों की ज़बान से 

लामाओं के गंभीर मग्न अंतर्बोध की गूंजती गहरी ध्वनी से 

ज्ञान के प्यासे मन-मस्तिष्कों की अज्ञात गहराइयों से




मै उठा |