सोचता हूँ
की चढ़ाऊँ प्रत्यंचा
और छोड़ दूं
शब्द बाण |
मगर किधर?
इस जलाशय की कलकल बहती आवाज़ पर
या पानी की हंसती खिलखिलाती अठखेलियों पर?
क्या बयाँ कर पाऊँगा यह अनन्य शान्ति का आभास?
नहीं जानता
शायद जानना भी नहीं चाहता
बस आभास
और मन के सौर्यमंडल में घूमते
सितारे-से विचार
और हर विचार एक छिपा, सोया सौर्यमंडल |
This is the melting pot of all my stuff... writings, cinema etc etc. It's going to be an interesting journey... Hop On!
December 2, 2010
Awakening
In the slumbering abyss of Eternity
I awoke
Resounding deep, a creature evolved, Beyond
A thought, as ancient as the first silence
Silent, as the hearts in union
Formless – as yesterday’s meal
I awoke.
And forgot
my eternal purpose.
I left home, wandered and returned
But only in body, never in the mind
I arose.
From the thirsty lips of Aghoris in Himalayas
From the grave musings of Llamas, rocking wisely
From the recesses of minds thirsty for knowledge
I arose
जागरण (Awakening)
असंख्य गहराइयों के अचेत चैतन्य में
मै उठा |
कहीं दूर गूंजता, एक नाद-स्वर-रूप
एक विचार, पहली शान्ति से प्राचीन
शांत, जैसे अदृश्य बंधन से जुड़े हृदय
रूपहीन, जैसे बीते कल के भोजन का स्वाद |
मै जागा
और स्मृति लोप का शिकार बना
भूल गया
मेरा सर्वस्व अस्तित्व
घर छोड़ कई यात्राएं कर लौटा
पर मन के घर में बंधा रहा
मै जागृत हुआ, जन्मा |
हिमाद्री में तप-ताप से जलते प्यासे अघोरियों की ज़बान से
लामाओं के गंभीर मग्न अंतर्बोध की गूंजती गहरी ध्वनी से
ज्ञान के प्यासे मन-मस्तिष्कों की अज्ञात गहराइयों से
मै उठा |
ॐ
मै उठा |
कहीं दूर गूंजता, एक नाद-स्वर-रूप
एक विचार, पहली शान्ति से प्राचीन
शांत, जैसे अदृश्य बंधन से जुड़े हृदय
रूपहीन, जैसे बीते कल के भोजन का स्वाद |
मै जागा
और स्मृति लोप का शिकार बना
भूल गया
मेरा सर्वस्व अस्तित्व
घर छोड़ कई यात्राएं कर लौटा
पर मन के घर में बंधा रहा
मै जागृत हुआ, जन्मा |
हिमाद्री में तप-ताप से जलते प्यासे अघोरियों की ज़बान से
लामाओं के गंभीर मग्न अंतर्बोध की गूंजती गहरी ध्वनी से
ज्ञान के प्यासे मन-मस्तिष्कों की अज्ञात गहराइयों से
मै उठा |
ॐ
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