May 12, 2010

Oh God!


They told me of Christianity and the Psalms

I could barely conceal my grin

I wanted to drink Zizek and Eisenhower

In a Red stained bottle of Gin

I took Manu with a pinch of salt

Smiled mischievously at 'His' green name on Asphalt

I laughed at Marx, at corporation

At preaching headbangers of desolation

I could not help rolling with laughter

When they talked of wrong, of revolution.

Then I paused, corrected myself to – rotflmao

And fell down again, laughing uncontrollably

But suddenly, a gun pointed at my head


What a joke, I thought, to die

These people worry too much, without knowing why

And so, adieu. Goodbye, blue sky.

Time


Hanging in time

Hovering

In a moment that is infinite

A loop, encircling a gyre of chaos

And yet fleeting.

A moment that never was.

The flash before the impact

The breath before death

The pause before the needle

The last glance of goodbye

A moment spread in infinitude

And engulfed by nothingness

Swift and lost.

And nothing....

but memories.

अलबेला सजन आयो रे (उस्ताद राशिद खान साहब को मेरा प्रणाम)

नीले अम्बर की हलकी शान्ति
सूखी, रेगिस्तान सी धरती
एक सूखा, भूरा पत्ता हलके से चर्र सी आवाज़ करता
अपनी झाड़ी से टूटा और नयी सैर को चला.

गहरी, सुनसान, सहमी सी शान्ति
और धरती की सूखी गहराई से वह पुकार
पूर्णता, तृप्ति की वह लालसा
रेगिस्तान की सूखी सी चीत्कार.

मेरा भवन

इस अजर भूमि में पनपता है ह्रदय
इसकी तरल वायु में मिलता सुकून
रबों में दौड़ती एक लहर, जीवन-सी
नसों में झलकता है खून.

कर दूं  खुद को न्योच्छावर इस कुटीर के लिए

चला दूं तूफ़ान, आंधी - है जूनून.

शांत-चित्त जब बैठता कट्टे पर
या फिर एसिड लेक के जल प्रतिबिम्ब में झांकता
पत्तों की स्निग्ध, मद्धम नृत्य को हलकी मुस्कान के साथ देखता
दूसरों पर व्यंग्य पर ठहाके लगता
और कभी शांत हो जाता.

घर में माँ की पुकार कहीं दूर से सुनाई देती
मेरे श्वान आते, दुम मटकाते
और एक हाँथ अचानक कंधे को हलके से छूता
'जय, चल ना यार'

दोस्तों की मुस्कुराती पुकार
शांत भाव (काश!) से लेक्चर में बैठ
लास्ट बेंच में पढ़ते पढ़ते सो जाना
और ब्रेक से कभी कभी वापस ही ना आना

टिप्प! बरखा की एक रेशमी बूँद
और एक स्वछंद प्रज्वलित अनोखा सौंदर्य
इस भवन को हरी चादर उढ़ा देता
हलकी बारिश. धरती की स्निग्ध खुशबु
और गरम चाय.

एक और बार (याद)

सांवली-सी, हलकी सी मुस्कान लेकर
ओ कमलनयनी, मृगगामिनी
मेरे स्वप्नों को अभिलाषित करती
खिलखिलाती, संस्फुरित करती.

एक पंख, शायद मोर का
हल्का-सा, मेरे खुरदुरे हाँथ में सिमटा
एक वीणा का तार किसी अधर में गूंजा
टिप्प - बरखा की एक बूँद भृकुटी पर सजी.

थिरकती हुई बदरी पहुंची परबत के पास

जलधार, ओ मल्हार
सारे प्राणी जागे, रंगों के अप्रतिम सौंदर्य के भाग बने
और थिरकन की तेज़ी बढ़ी
सारे रंग एक दूसरे से मिलते, भागते, खेलते,
नए रूप में बनते, और ख़त्म हो जाते
मल्हार की गति में समाते
सितार के झालर में नाचते,
स्वर-रस में नहाते

और अन्दर से गूंजता ॐ नाद
और इस सुदृश सौंदर्य, रंगों के संसार में दिखती तुम
स्वर्ण जल 
________.

बेचैन


बेचैन
आज बेचैन

आगोश के अंजाम से बेचैन
हर अधूरे काम से बेचैन
याद आते हर लम्हे
की कटु जुबां से बेचैन

छलछलाते सपनों के सच से बेचैन
दोस्तों की आँखों के अलविदा से बेचैन .
बेवक्त चैन और रतनारे नैन से बेचैन
घूम रहा मनगढ़ंत सागर और गिरी में
लहरों की सौम्य गहरी सी शान्ति - पर मैं बेचैन.

शायद गहराइयों में डूबे चन्द्रमा की डोर से लटकूँगा.
इस सुदृश सूरज के धधकते तेज़ में .... मैं बेचैन