सोचता हूँ
की चढ़ाऊँ प्रत्यंचा
और छोड़ दूं
शब्द बाण |
मगर किधर?
इस जलाशय की कलकल बहती आवाज़ पर
या पानी की हंसती खिलखिलाती अठखेलियों पर?
क्या बयाँ कर पाऊँगा यह अनन्य शान्ति का आभास?
नहीं जानता
शायद जानना भी नहीं चाहता
बस आभास
और मन के सौर्यमंडल में घूमते
सितारे-से विचार
और हर विचार एक छिपा, सोया सौर्यमंडल |
No comments:
Post a Comment