May 12, 2010

मेरा भवन

इस अजर भूमि में पनपता है ह्रदय
इसकी तरल वायु में मिलता सुकून
रबों में दौड़ती एक लहर, जीवन-सी
नसों में झलकता है खून.

कर दूं  खुद को न्योच्छावर इस कुटीर के लिए

चला दूं तूफ़ान, आंधी - है जूनून.

शांत-चित्त जब बैठता कट्टे पर
या फिर एसिड लेक के जल प्रतिबिम्ब में झांकता
पत्तों की स्निग्ध, मद्धम नृत्य को हलकी मुस्कान के साथ देखता
दूसरों पर व्यंग्य पर ठहाके लगता
और कभी शांत हो जाता.

घर में माँ की पुकार कहीं दूर से सुनाई देती
मेरे श्वान आते, दुम मटकाते
और एक हाँथ अचानक कंधे को हलके से छूता
'जय, चल ना यार'

दोस्तों की मुस्कुराती पुकार
शांत भाव (काश!) से लेक्चर में बैठ
लास्ट बेंच में पढ़ते पढ़ते सो जाना
और ब्रेक से कभी कभी वापस ही ना आना

टिप्प! बरखा की एक रेशमी बूँद
और एक स्वछंद प्रज्वलित अनोखा सौंदर्य
इस भवन को हरी चादर उढ़ा देता
हलकी बारिश. धरती की स्निग्ध खुशबु
और गरम चाय.

1 comment:

  1. अनिल सौमित्रJuly 6, 2010 at 11:35 AM

    भइया ये भी तन्मय से कम शायराना नही है, लेकिन घर वाली बात है,तो अच्छी लगी. .

    ....घर में माँ की पुकार कहीं दूर से सुनाई देती
    मेरे श्वान आते, दुम मटकाते
    और एक हाँथ अचानक...

    यही तो "भवन" को घर बना देते है..यही मिलता..है..जीवन !

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